"बचपन" जिंदगी का सबसे खूबसूरत समय होता है। मैं जब छोटा था तब सोचता था इक बार जल्दी से बड़ा हो जाऊ फिर तो बस मस्ती ही मस्ती,फिर कोई रोक टोक करने बाला नहीं होगा।जो जी में आएगा करेगे। लेकिन आज सोचता हु काश फिर से वो दिन लोटकर आ जाये। कितने हसीं दिन थे वो, जीवन में कितनी सच्चाई थी। जब खुश हुए हँस दीये,जब दर्द हुआ रो दीये। आज जीवन कितना बनाबटी हो गया है ना खुल के हँस सकता हू ना ही खुल के रो सकता हू।
जब कभी घर में कोई कटी पतंग आ कर गिरती,मम्मी नयी गेंद दिलाती, पढाई करने समय लाइट चली जाती तो मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। उन्ही खुशीयों को और बड़ा करने के लिए और नयी खुशियाँ की मंजिले पाने के चल पड़े जिन्दगी के सफ़र पर, फिर बस चलते गए चलने गए राह में कई मुश्किले भी पड़ी, बड़े साहस से उन्हें पार किया लेकिन इस दौरान ये ही भूल गए की हम चले क्यों थे। मंजिले निकल गयी पर उनपर ध्यान ही नही गया और हम रास्तो में ही भटकते रहे।
दिया था जलना, क्योकि अँधेरी थी रात
जलाने में दिया, मैं मग्न हुआ इतना
की सुबह के सूरज को ही भूल गया।
निकले थे घर से, खाने को बेर
उलझ गया दामन, काँटों में इतना
की मैं बेर खाना ही भूल गया।
कुछ फूल थे चुनने, सनम के लिए
जुस्तजू में फूलो की, उलझा फिर कुछ ऐसा
की सनम को ही भूल गया।
घर से चले थे हम तो, ख़ुशी की तलाश में!
जब मिली ख़ुशी तो, हम खुश होना भूल गए!!
जब मिली ख़ुशी तो, हम खुश होना भूल गए!!