Tuesday, June 11, 2013

' चाहत ' सागर की बूंद की

चाहत  है  मुझको 
बादल  तुझको  पाने  की । 











देखकर  तप सूरज का 
उससा तपी बन  जाने की ।  
चाहत है कुछ  कर जाने की 
पावन जीवन को पाने की । 

कड़वे-खारेपन से दूर 
मीठा नीर बन जाने की । 
मधु में अस्तित्व  पाकर 
फूलो में मुस्काने की । 

चाहत  है  मुझको 
बादल  तुझको  पाने  की । 

साथी से गरमी लेकर 
दिल में आग धधकाने  की । 
मलिन विचारो को तजकर 
हवा से हल्का हो जाने की । 

अपनी ही आशाओं से बढकर 
बादल में आशियां पाने की । 
फिर बैठ हवा के कंधो पर 
जगत भ्रमण कर आने की । 

चाहत  है  मुझको 
बादल  तुझको  पाने  की । 

प्यासा जग-जन-जीवन देखकर 
आशा बन  छा जाने की । 
ममता माँ-धरा की पाकर 
नमी दिल में भर आ जाने की । 

आशा मनु-संतानों  की पाकर 
ऊपर , और ऊपर उठ जाने की । 
व्याकुल राधा की देख विरह 
फिर पानी में बदल जाने की । 

चाहत  है  मुझको 
बादल  तुझको  पाने  की । 

कर्मठता मानव की देखकर 
झुक आने की , झुक आने की । 
नव-नूतन पुष्पों पर छाकर 
प्रियेतम का आलिंगन पाने की । 

श्वेत हिमालय में गिरकर
ऊँचा चरित्र उठाने की । 
आशीर्वाद धरा का पाकर 
हिम सा धवल बन जाने की । 

चाहत  है  मुझको 
बादल  तुझको  पाने  की । 







2 comments:

Unknown said...

bahut achchi chahta hai..mujh me bhi jag gayi hai

Krishna Nand Gupta said...

Thank you Sir :)