बेखुदी में था कट रहा सफ़र
खुद , खुदी से था बेखबर ।
मंजिल की चमक ना आँखों में थी
ना उसके ना होने की कसक आहो में थी ।
न दिशाओ का ज्ञान था
पतझड़ के टूटे -पात सा, मैं गुमनाम था ।
मौसम तो बहारो का था
गुल चमन और सितारों का था ।
पर मैं इक जड़वत पत्थर सा
खड़ा किनारे पर था ।
तभी इक मंद आहट सी हुई ।
दिल में इक चाहत सी हुई ।
उनके आने का अंदाज निराला सा था ।
बाल रेशम से , और बदन मधुशाला सा था ।
हम उन्हें इकटक देख रहे थे
दिल को भटकने से रोक रहे थे ।
तभी हमें मंजिल न होने पर , गुमां सा हुआ
राहो में भटकने में , ख़ुशी का शमां सा हुआ
महक से उनकी मैं मदहोश हुआ
निज जडवत अस्तित्व, रूप सागर में आगोश हुआ ।
उस दिन अहसास हुआ ।।
उस दिन अहसास हुआ ।।
**This poem is flash of inspiration from someone :)
खुद , खुदी से था बेखबर ।
मंजिल की चमक ना आँखों में थी
ना उसके ना होने की कसक आहो में थी ।
न दिशाओ का ज्ञान था
पतझड़ के टूटे -पात सा, मैं गुमनाम था ।
मौसम तो बहारो का था
गुल चमन और सितारों का था ।
पर मैं इक जड़वत पत्थर सा
खड़ा किनारे पर था ।
तभी इक मंद आहट सी हुई ।
दिल में इक चाहत सी हुई ।
उनके आने का अंदाज निराला सा था ।
बाल रेशम से , और बदन मधुशाला सा था ।
हम उन्हें इकटक देख रहे थे
दिल को भटकने से रोक रहे थे ।
तभी हमें मंजिल न होने पर , गुमां सा हुआ
राहो में भटकने में , ख़ुशी का शमां सा हुआ
महक से उनकी मैं मदहोश हुआ
निज जडवत अस्तित्व, रूप सागर में आगोश हुआ ।
उस दिन अहसास हुआ ।।
उस दिन अहसास हुआ ।।
ख़ुशी ना किसी को पाने या खोने साहस है ।
ख़ुशी का ना मंजिल, ना राहो , ना आशियाने में आवास है ।
चाहे मंजिल हो बेगानी , चाहे रहे हो अनजानी
ख़ुशी तो साथ हमसफ़र के, होने का अहसास है ।
इसीलिए आज हम, साथ उनकी यादों के हो गये ।
माँझी सा स्थिर , पर सवार लहरों पर हो गये ॥
**This poem is flash of inspiration from someone :)

2 comments:
खुबसूरत अहसास .....
Thanks you Maa'm :)
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