Saturday, January 1, 2011

नव वर्ष की शुभकामनाये

आयु दिनों में कुछ इस तरह जाती है
जैसे सागर तट पर तरंगो आती जाती है
पर कुछ तरंगे सुनामी की तरह होती है
प्रबलता जिनकी नहीं अनुमानी होती है

दिन के सकून को जो तार तार कर जाती है
विश्वास की दीवारों को चकनाचूर कर जाती है
आत्मविश्वास की ईटे को कुछ इस तरह ढहाती है
जैसे हवा पतझड़ में सूखे पत्तो  को उड़ाती है

सपने आशाये उम्मीदे पानी में बह जाती है
सोचे खड़ा होकर चलने की  तो  रूह काँप जाती है
साँसे अपनी भी बेगानी सी लगाती है
जैसे सुनामी के बाद हर लहर अनजानी सी  लगाती है

मन से ये उदासी क्यों नहीं जाती है
सोचो तो रैन के बाद ही प्रभात आती है
लाया था तू क्या जो खोने की गमी है
होंसलो के बल पर ये दुनिया थमी है

छोड़ कर तू भीरूता, आत्म सम्मान को परवान कर
त्याग कर तू कालिमा, नव सूरज को प्रणाम कर
पहचानकर  तू भ्रम को, यथार्थ में नव निर्माण कर
बीत गया अतीत अब, नव वर्ष का अभिनंदन कर

यह कविता मेरे परिवारजन और मित्रो को समर्पित है
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये :)

3 comments:

Saurabh Gupta said...

wow!! :)
Beautiful!!
keep writing sir! :)

Artgallery said...

sahi KN.....though i could not understand most of the things :P .....but keep it up !! ....

Krishna Nand Gupta said...

Thanks..
precarious effort to comfort self