आयु दिनों में कुछ इस तरह जाती है
जैसे सागर तट पर तरंगो आती जाती है
पर कुछ तरंगे सुनामी की तरह होती है
प्रबलता जिनकी नहीं अनुमानी होती है
दिन के सकून को जो तार तार कर जाती है
विश्वास की दीवारों को चकनाचूर कर जाती है
आत्मविश्वास की ईटे को कुछ इस तरह ढहाती है
जैसे हवा पतझड़ में सूखे पत्तो को उड़ाती है
सपने आशाये उम्मीदे पानी में बह जाती है
सोचे खड़ा होकर चलने की तो रूह काँप जाती है
साँसे अपनी भी बेगानी सी लगाती है
जैसे सुनामी के बाद हर लहर अनजानी सी लगाती है
मन से ये उदासी क्यों नहीं जाती है
सोचो तो रैन के बाद ही प्रभात आती है
लाया था तू क्या जो खोने की गमी है
होंसलो के बल पर ये दुनिया थमी है
छोड़ कर तू भीरूता, आत्म सम्मान को परवान कर
त्याग कर तू कालिमा, नव सूरज को प्रणाम कर
पहचानकर तू भ्रम को, यथार्थ में नव निर्माण कर
बीत गया अतीत अब, नव वर्ष का अभिनंदन कर
यह कविता मेरे परिवारजन और मित्रो को समर्पित है
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये :)
3 comments:
wow!! :)
Beautiful!!
keep writing sir! :)
sahi KN.....though i could not understand most of the things :P .....but keep it up !! ....
Thanks..
precarious effort to comfort self
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